माँ कौशल्या चालीसा
।। अथ श्री कौशल्या चालीसा ।।
दोहा:- हे कौशल्या मातु श्री, बारंबार प्रणाम।
पुनि बंदउँ श्रीराम जी, चंदखुरी सम धाम।।
भारत माँ की गोद में, है छत्तीसगढ़ राज।
राम जन्म कारण बना, पूजे सकल समाज।।
छत्तीसगढ़ की सुंदर माटी। नदियाँ जंगल पर्वत घाटी।।
महतारी की दर्जा पाये। महिमा जिनकी सब जन गाये।।
जिला रायपुर अब रजधानी। चंदखुरी की सुनो कहानी।।
छत्तीसगढ़ की नाम पुरातन। दक्षिण कोसल है शुभ पावन।।
राज करे जहँ भानुमंत जी। प्रजा हितैषी नेक संत जी।।
नाम सुबाला उनकी रानी। करै आचरण पति रुख जानी।।
आया समय परम सुखदाई। बेटी घर में जन्में आई।।
भानुमंत जी खुशी मनाये। नर नारी मिल दीप जलाये।।
नामकरण शुभ अवसर जानी। कौशल्या राखे गुरु ज्ञानी।।
कौशल्या की अमर कहानी। पूर्व जन्म थी मनु की रानी।।
पति अनुसरहिं नाम सतरूपा। सत्य आचरण करहिं अनूपा।।
एक कल्प कश्यप की रानी। मातु अदिति थी परम सयानी।।
पति सँग विकट तपस्या कीन्हा। प्रगटे प्रभु इच्छित वर दीन्हा।।
तुम सम पुत्र पाऊँ मैं स्वामी। तब बोले हरि अंतर्यामी।।
त्रेतायुग सुत पाहौ मोहू । तुम दसरथ कौशल्या होहू।।
माता तब मैं सुत बन आहौं। अंशन्ह सहित स्नेह मैं पाहौं।।
भूप अवध के दशरथ ज्ञानी। बने तहाँ दशरथ की रानी।।
शांता नाम सुता इक पाहे। श्रृंगी ऋषि छत्तीसगढ़ ब्याहे।।
पुत्र बिना व्याकुल दशरथ मन। दिए उपाय तुरत तब गुरुजन।।
राजा श्रृंगी ऋषिहिं बुलाये। पुत्रकामना यज्ञ कराये।।
पाये तब सुत चार मुदित मन। राम लखन अरु भरत शत्रुहन।।
अल्पकाल सब विद्या पाये। जनकपुरी में ब्याह रचाये।।
पिता वचन प्रभु वन में जाये। सिया लखन भी साथ निभाये।।
केंवट अत्रिन्ह ऋषि मुनि तारे। खर दूषण सब निशिचर मारे।।
सिया हरण कर रावण जाये। खोजत राम लखन अकुलाये।।
शबरी नवधा भक्ति सुनाए। सिया खोज कपि भालु पठाए।।
हनुमत सीता खबर सुनाई। सेतु बाँधि प्रभु किये चढ़ाई।
मारे कुम्भकरन घननादा। लंका रावण मरण विषादा।।
राज विभीषण कहँ प्रभु दीन्हा। राज अवधपुर आ प्रभु कीन्हा।।
दुखद समय तब इक दिन आये। सीता को वन राम भिजाये।।
आइ रहे वाल्मीकि सुआश्रम। लव कुश जन्मे बने वीर वन।।
छत्तीसगढ़ निज भाग्य सराहे। राम लला सम भांजा पाहे।।
नारी शक्ति स्वरूपा माई। जग संचालन राह दिखाई।।
विश्ववन्दिता मातु सुपुनीता। माँ वात्सल्यमयी जग जीता।।
छत्तीसगढ़िया खुशी मनाये। सारा जगत दरश को आये।।
एक मात्र मंदिर माता की। पूर्ण विश्व में जग त्राता की।।
मध्य सरोवर मंदिर सुंदर। राम लला सँग राजे अंदर।।
रिद्धि सिद्धि तिहुँ लोकहिं आई। तव मंदिर में रहे समाई।।
आस लगा जो भक्तन आवै। मनवांछित फल तुरतहिं पावै।।
पाठ करे जो यह चालीसा। कृपा करै तापर गौरीसा।।
चैत्र शुक्ल नवमीं तिथि पावन। दिन गुरुवासर परम सुहावन।।
संवत् अस्सी अरु सौ बीसा। पूर्ण किये जगदीश चालिसा।।
दोहा :- हे जननी श्री राम की, दीजै माँ आशीष।
राम लला सँग उर बसो, शरण पड़े जगदीश।।
।। इति श्री कौशल्या चालीसा ।।
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